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भगवान बुद्ध की शिक्षा – सबसे आसान शब्दों में

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एक दिन एक आदमी भगवान बुद्ध के पास आता है और उनसे कहता है कि वह उनसे शिक्षा ग्रहण करना चाहता है लेकिन आसान शब्दों में ।

क्योंकि ज्यादातर बड़े-बड़े महात्मा और बुद्ध पुरुष एक रहस्यमयी भाषा में अपनी शिक्षा बताते हैं, वे सीधे आपको आपके सवालों के जवाब नहीं देते हैं ।

लेकिन इस आदमी ने प्रार्थना की कि वह आसान शब्दों में अपनी शिक्षा बताएं तो भगवान बुद्ध ने उस व्यक्ति से पूछा- क्या तुम्हारा कोई बेटा है?

आदमी ने हाँ में जवाब दिया |

फिर बुद्ध ने पूछा क्या तुम्हारे भाई का कोई बेटा है ? आदमी ने फिर हां में जवाब दिया |

फिर बुद्ध ने पूछा क्या तुम्हारे पड़ोसी का कोई बेटा है ? आदमी ने हाँ में अपना सिर हिला दिया |

इसके बाद भगवान बुद्ध ने पूछा क्या तुम जिन लोगों को नहीं जानते हो उनके बेटे होंगे ? आदमी ने जवाब दिया हाँ .

तब भगवान बुद्ध ने कहा अगर तुम्हारे बेटे की मृत्यु हो जाए तो तुम्हें कितना दुख होगा?

उस आदमी ने जवाब दिया- भगवान मैं पूरी तरह टूट जाऊंगा, मुझे अत्यंत दुख होगा, मेरी दुनिया खत्म हो जाएगी और मैं इस दुखद समाचार को बर्दाश्त कर पाऊंगा या नहीं मुझे नहीं पता |

तब बुद्ध ने पूछा – अगर तुम्हारे भाई के बेटे की मृत्यु हो जाए तब तुम्हें कैसा लगेगा ? आदमी ने जवाब दिया – मुझे अत्यंत दुख होगा लेकिन उतना नहीं जितना मुझे अपने बेटे को लेकर होता |

फिर बुद्ध ने पूछा – अगर तुम्हारे पड़ोसी के लड़के की मृत्यु हो जाए तो तुम्हें कैसा लगेगा ? आदमी ने जवाब दिया – मुझे दुख होगा लेकिन उतना नहीं.

फिर बुद्ध ने पूछा जिस व्यक्ति को तुम बिल्कुल नहीं जानते अगर उसके लड़के की मृत्यु हो जाए तो तुम्हें कितना दुख होगा ? आदमी ने जवाब दिया – मुझे कोई दुख नहीं होगा |

तब बुद्ध ने पूछा तो अब तुम्हें क्या लगता है तुम्हारे दुख की मात्रा किस बात से प्रभावित हो रही है?

कुछ देर सोचने के बाद आदमी ने जवाब दिया – दुख की मात्रा मैं और मेरा से प्रभावित हो रही है, मेरा बेटा, मेरे भाई का बेटा, मेरे पड़ोसी का बेटा, मेरा दुख, मेरे भाई का दुख, मेरे पड़ोसी का दुख |

बुद्ध ने कहा – जब तुम अपने बेटे के साथ समुद्र के किनारे घूमने जाते हो तो क्या तुम्हारा बेटा बालू के महल और किले बनाकर उनसे खेलता है? आदमी ने जवाब दिया – हाँ | जब समुद्र का झोंका उस महल को गिरा देता है और तुम्हारा बेटा रोने लगता है तो क्या तुम भी रोने लगते हो? आदमी ने जवाब दिया – नहीं |

बुद्ध ने पूछा- क्यों ? आदमी ने कहा भगवान बच्चे को लगता है कि यह महल बहुत ही सुंदर है और हमेशा के लिए है इसलिए वह उससे अटैच हो जाता है और उसके टूटने पर रोने लगता है लेकिन मुझे पता है कि वह बालू का महल स्थाई नहीं है इसलिए मुझे कोई अटैचमेंट नहीं होता और उसके नष्ट होने से मुझे कोई दुख भी नहीं होता |

बुद्ध ने कहा- अगर तुम सत्य को सत्य की तरह नहीं देखोगे तो तुम इस संसार के इस मायाजाल में इसी तरह दुख भोंकते रहोगे ?

तुम्हारे और तुम्हारे उस बेटे में जो कि बालू के महल के गिरने पर रोने लगता है दोनों में कोई अंतर नहीं है, जिस तरह से बालू के अस्थाई महल के गिरने पर तुम्हारे बेटे का रोना तुम्हें बचकाना लगता है, वैसे ही तुम्हारा भी इस क्षणभंगुर यानी कि Temporary World से इतना अटैचमेंट एक बचकानी बात से ज्यादा कुछ नहीं है |

सत्य को सत्य की तरह देखना सीखो वही सारे दुखों से मुक्ति का उपाय है |

दोस्तों, भगवान बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं में नॉन-अटैचमेंट यानी कि लगाव को छोड़ने पर ज्यादा जोर दिया है क्योंकि जब आप किसी व्यक्ति या वस्तु से खुद को अटैच कर लेते हो तो जब वह आपसे अलग होती है तो आप असीम दुख का अनुभव करते हैं |

इसका मतलब यह नहीं है कि आप सब कुछ छोड़कर जंगलों – गुफाओं में एकांतवास करने लगे | लोगों और वस्तुओं के बीच रहते हुए भी आप नॉन-अटैचमेंट की प्रैक्टिस कर सकते हैं, सत्य को ज्यों का त्यों देखने की आदत डाल कर | फिर किसी रिश्ते के टूट जाने से, किसी अपने के चले जाने से, किसी महल के गिर जाने से आपको दुख का अनुभव नहीं होगा, क्योंकि आपको इस सत्य का ज्ञान है कि यहां कुछ भी स्थाई न है, न था और न रहेगा |

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