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अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी ने कल्पना चावला के नाम पर रखा अपने स्पेसक्राफ्ट का नाम

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अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी नॉर्थरोप ग्रुमैन ने भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री दिवंगत कल्पना चावला को सम्मानित करते हुए अपने सिग्नस स्पेसक्राफ्ट का नाम उनके नाम पर रखा है। कंपनी ने कहा कि कल्पना चावला के मानव अंतरिक्ष उड़ान में योगदान का असर काफी प्रभावी है। गौरतलब है, कल्पना की मौत 2003 में स्पेस शटल दुर्घटना में हुई थी।

अंतरिक्ष जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला को बड़ा सम्मान मिला है। एयरोस्पेस कंपनी नॉर्थरोप ग्रुमैन ने अपने लांच होने वाले सिग्नस स्पेसक्राफ्ट का नाम भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के नाम पर रखा है। सिग्नस स्पेसक्राफ्ट इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में 29 सितंबर को छोड़ा जाएगा।

सिग्नस स्पेसक्राफ्ट के निर्माता नॉर्थरोप ग्रूममैन ने एक ट्वीट में घोषणा की, ‘आज हम कल्पना चावला का सम्मान करते हैं, जिन्होंने नासा में भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री के रूप में इतिहास बनाया है। आगे कहा ‘मानव अंतरिक्ष यान में उनके योगदान का स्थायी प्रभाव पड़ा है। मिलिए हमारे अगले Cygnus यान, S.S. कल्पना चावला से।’

नॉर्थरोप ग्रूममैन ने कहा, ‘यह कंपनी की परंपरा है कि प्रत्येक सिग्नस का नाम एक ऐसे शख्स के नाम पर रखा जाए जिसने मानव अंतरिक्ष यान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। कल्पाना चावला को अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला के रूप में इतिहास में उनके अहम स्थान के सम्मान में चुना गया था।’

दरअसल, 16 जनवरी, 2003 को अमेरिकी अंतिरक्ष यान कोलंबिया के चालक दल के रूप में अंतरिक्ष में जाने वाली भारत की पहली महिला बनी थीं। 01 फरवरी 2003 को अंतिरक्ष में 16 दिनों का सफर पूरा करने के बाद वापसी के दौरान पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते समय और निर्धारित लैंडिंग से सिर्फ 16 मिनट पहले साउथ अमेरिका में अंतिरक्ष यान कोलंबिया दुर्घटननाग्रस्त हो गया और यान कई टुकडों में बंटकर नष्ट हो गया। इस हादसे में कल्पना चावला समेत सभी चालक दल जान गंवा बैठे थे। तीन साल बाद सुनीता विलियम्स 2006 में भारतीय मूल की दूसरी अंतरिक्ष यात्री बन गईं।

गौरतलब है कि 17 मार्च 1962 को हरियाणा के करनाल में कल्पना का जन्म हुआ था।  उन्हें आकाश से इतना प्यार था कि वह बचपन से ही हवाई जहाज के चित्र बनाती थी। 20 साल की उम्र में वह अमेरिका चली गईं और एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर नासा में काम करना शुरू कर दिया। उन्हें पहली बार 19 नवंबर 1997 को अंतरिक्ष में जाने का मौका मिला। उनके काम से खुश होकर नासा ने उन्हें फिर 16 जनवरी 2003 को अंतरिक्ष में भेजा।

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